यूं आज फिर अकेला हूं तन्हां इस अंधेरी रात में वो सपने टूट गए फिर से जो संजोए थे बैरी बरसात में। वो साथ जीने, मरने की कसमें आज फिर खोखली सी पड़ गई बाबु, सौना, जान, आज फिर किसी और की बाहों में सो गई। एक सच्चा प्यार, इस जमाने में आखिर! किसको मिला होगा? मैं जब बैठा किसी महखाने में तो हज़ारों ख़ुदाओं से जा मिला। मगर जाम की तली में भी तेरी याद ही उतर आई, हर घूंट में तेरी हँसी थी हर साँस में तेरी परछाईं। धुएँ में ढूँढा तेरा चेहरा, राख में ढूँढे अरमान, दिल ने फिर भी तुझको चाहा, टूटा होकर भी अनजान। रात ने चुपके से पूछा, कब तक यूँ ही रोओगे? जिसे खो दिया किस्मत में, क्या उसे ही ढोओगे? मैंने आह भर के ये सोचा, दर्द भी अब अपना सा है, तू भले किसी और की हो, पर प्यार तो मेरा सच्चा सा है। सुबह की हल्की किरणों ने जब पर्दा सा हटाया, अंदर कहीं एक उम्मीद ने धीरे से सिर उठाया। शायद हर टूटा सपना नया सबक दे जाता है, जो दिल से बहुत करीब हो वही सबसे ज्यादा रुलाता है। अब सीख लिया है मैंने भी खुद से रिश्ता निभाना, भीड़ में रहकर भी अपने अंदर घर सा बनाना। यूँ आज फिर अकेला हूँ...