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अकेलापन (काव्य प्रस्तुति) - गौरव पालीवाल स्वरचित कविता @xeriopediQa.online

यूं आज फिर अकेला हूं  तन्हां इस अंधेरी रात में  वो सपने टूट गए फिर से  जो संजोए थे बैरी बरसात में। वो साथ जीने, मरने की कसमें  आज फिर खोखली सी पड़ गई  बाबु, सौना, जान, आज फिर  किसी और की बाहों में सो गई। एक सच्चा प्यार, इस जमाने में  आखिर! किसको मिला होगा? मैं जब बैठा किसी महखाने में तो हज़ारों ख़ुदाओं से जा मिला। मगर जाम की तली में भी तेरी याद ही उतर आई, हर घूंट में तेरी हँसी थी हर साँस में तेरी परछाईं। धुएँ में ढूँढा तेरा चेहरा, राख में ढूँढे अरमान, दिल ने फिर भी तुझको चाहा, टूटा होकर भी अनजान। रात ने चुपके से पूछा, कब तक यूँ ही रोओगे? जिसे खो दिया किस्मत में, क्या उसे ही ढोओगे? मैंने आह भर के ये सोचा, दर्द भी अब अपना सा है, तू भले किसी और की हो, पर प्यार तो मेरा सच्चा सा है। सुबह की हल्की किरणों ने जब पर्दा सा हटाया, अंदर कहीं एक उम्मीद ने धीरे से सिर उठाया। शायद हर टूटा सपना नया सबक दे जाता है, जो दिल से बहुत करीब हो वही सबसे ज्यादा रुलाता है। अब सीख लिया है मैंने भी खुद से रिश्ता निभाना, भीड़ में रहकर भी अपने अंदर घर सा बनाना। यूँ आज फिर अकेला हूँ...
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राधा-कृष्ण मनोहरत (काव्य प्रस्तुति) - गौरव पालीवाल स्वरचित कविता @xeriopediqa.online

मन बावरा चंचल हरि के नाम का राधा की बैरंग कपि मुस्कान का, महकी है गलियां, मध्य बरसाने की हैं साध-संगत सुमिरन बांसुरी वाद की। मन रमा हैं, मन थमा हैं, मंद अवस्थाओं में  खुली हैं बरसाने की गलियां श्री-हरि नाम में, क्यों राधा नाम अधूरा है श्री कृष्ण के बिना क्यों श्री कृष्ण अधूरे हैं राधा रानी बिना। जहाँ श्याम की बंसी, राधा की सांसों में जहाँ प्रेम उतर आए मौन-सी बातों में, वहीं ठहर गया समय, वहीं सिमट गई सृष्टि वहीं पाया मन ने जीवन का अर्थ अंतिम हैं। राधा में कृष्ण हैं, कृष्ण में राधा बसी दोनों की लीला एक, भले दो देह दिखी, ना भक्ति बिना भगवान, ना प्रेम बिना पहचान एक-दूजे के बिना अधूरा है अस्तित्व महान। बरसाने की माटी भी मंत्र जपती है हर कण में राधे-श्याम की छवि बसती है, जो नाम जपे इनका, वो स्वयं नाम हो जाए जो प्रेम समझ ले इनको, वो हरि में खो जाए। अब मन ना मांगे कुछ, ना कोई संसार बस चरणों में लिख जाए जीवन का सार, राधा-श्याम के प्रेम में जो लीन हुआ वही सच में जाना, क्या है ईश्वर का रूप सदा। श्री कृष्ण की लीलाओं से  सृष्टि का रोम-रोम महका है, राधा रानी की मुस्कान से  ...